नरसिंहगढ़ शहर श्यामजी साँका मंदिर-नरसिंहगढ़
जालपा माता मंदिर-राजगढ़ दरगाह शरीफ़ राजगढ़
चिड़ीखों -नरसिंहगढ़ ब्यावरा मांडू-नरसिंहगढ़
कोटरा -नरसिंहगढ़ खोयरी महादेव मंदिर-राजगढ़
   
  नरसिंहगढ़ शहर  

शहर करीब 300 साल पुराना है इसकी दीवान परसराम द्वारा 1681 में स्थापना की गई थी । शहर में सुंदर झील है जिसमें पुराना किला परिलक्षित होता है और महल मे अभी भी संस्थापक के नाम दिखाई देते है । यह शहर भोपाल से 83 किलोमीटर की दूरी पर है ।

शहर मे शिव मंदिर है जिसे टोपिला महादेव के रूप में जाना जाता है - शरद महीनों में यह जगह बेहद खूबसूरत और सुंदर हो जाती है । वनस्पति के साथ कवर पहाड़ियों और पहाड़ियों की ढलान नीचे छोटी नदियों के साथ, हरे भरे घास में कालीन के साथ बैजनाथ महादेव मंदिर के ऊपर से सुखद पैनोरमा, पूर्ण पारदर्शक पानी की झीलों के साथ, बहुत ही आकर्षक है ।

 

 

 

  श्यामजी साँका मंदिर-नरसिंहगढ़  

साँका पार्वती नदी के पास स्थित एक छोटा सा गांव है यह राजगढ़ राज्य का तहसील मुख्यालय था, यह कोटरा से 5 किमी दूर है। माघ माह मे हर साल यहां एक मेला आयोजित किया जाता है और यह प्रसिद्ध मंदिर 16-17वी शताब्दी में राजा संग्राम सिंह (श्याम सिंह) की स्मृति मे पत्नी भाग्यवती द्वारा बनाया गया था । यहा राजा हाजी वली की एक मुगल सैनिक के साथ हुई मुठभेड़ में मौत हो गई थी । यह मंदिर राज्य सरकार द्वारा संरक्षित है। । यह मालवी और राजस्थानी प्रभाव को दर्शाती है दीवार पर सुंदर चित्र है, सुंदर और अच्छी तरह से नक्काशीदार पत्थर और ईंटे को मंदिर के निर्माण के लिए इस्तेमाल किया गया।

 

 

 

 

 

  जालपा माता मंदिर-राजगढ़  

यह सुंदर मंदिर राजगढ़ से सिर्फ 4 किलोमीटर दूर है । यह ऊँची पहाड़ी पर है और ऊपर से शहर का एक सुरम्य दृश्य देख सकते हैं। यह घने जंगल मे पौधों की विभिन्न किस्मे है। भक्त नवरात्रि के मौसम में अलग-अलग हिस्सों से यह आते हैं।

 

 

 

 

 

  दरगाह शरीफ़ राजगढ़  

हज़रत बाबा बदख़्शानी र.अ. के नाम से मशहूर बुज़ूर्ग सूफ़ी (पीरे तरीक़त) जिनका आस्ताना (दरगाह शरीफ़) शहर राजगढ़ तहसील व जिला राजगढ़ मध्यप्रदेश में स्थित है। आपका नाम ’’शाह सैयद क़ुरबान अली शाह बदख़्शानी रहमतुल्लाह अलैह’’ है। आपका जन्म बदख़्शान जो के उस समय ख़ुद मुख़्तार इस्लामी सल्तनत थी (वर्तमान अफ़गानिस्तान में) में सन 1245 हिजरी में हुआ। इसीलिए आप बदख़शानी कहलाए। आप माता पिता की इकलोती संतान थे। आपके पिता का नसब हसनी तथा माता का हुसैनी है। दर असल आपके पिता मक्का सउदी अरब के थे लेकिन फ़ातेहाने अरब के साथ इस मुल्क में आए और यहां की दिलकश आबो-हवा के कारण बदख़्शान ही में बस गए। दो वर्ष की आयु में आपकी माता का स्वर्गवास हो गया तब आपकी परवरिश की ज़िम्मेदारी दादी साहिबा ने संभाली। पांच वर्ष की आयु में विधिवत् कुरआन की शिक्षा माता (सौतेली) ने प्रारम्भ कराई तथा अन्य धार्मिक शिक्षा के लिए उस समय के मशहूर बुज़ुर्ग सूफ़ी शैख़ कलीमुल्लाह साहब को मुन्तख़ब किया गया। छः वर्ष की आयु में आपकी दादी साहिबा का भी स्वर्गवास हो गया। एक दिन कुरआन का पाठ न सुनाने पर माता ने सज़ा दी और घर से बाहर खड़ा कर दिया। बाहर बर्फ़बारी हो रही थी सो आप सर्दी की शिद्दत से बेहोष हो गए। जब फुफी साहिबा को पता चला तो आपको उठा कर अपने घर लाईं और आग जला कर कमरा गर्म किया तब आपको होश आया फिर जीवन पर्यन्त फुफी साहिबा ने अपने पास ही रखा। एक दिन आपने फुफी साहिबा से कहा कि मुझे क़ुरआन याद है आप सुन लीजिए। फुफी साहिबा ने सुनना शुरु किया आपने 5 पारे (कुरआन के 30 भागों में से 5 भाग) सुना दिए। इसी तरह 5-5 भाग रोज़ सुनाकर पूरा क़ुरआन मौखिक सुना दिया। अब क्या था बचपन ही में यह करामत (चमत्कार) देख कर सब लोग मुबारकबाद देने लगे कि जो बच्चा कुरआन के प्रथम भाग की शिक्षा ले रहा हो और वह बिना किसी कोशीश और तालीम के पूरा कुरआन मौखिक सुना दे वह पैदाइशी वली ही हो सकता है। इसी प्रकार करामातों का सिलसिला चलता रहा आपकी कई करामातें मशहूर हैं।

आपने अपने वतन से मक्का पैदल सफ़र किया हज अदा करके मदीना गए और वहां सात साल क़याम किया इस प्रकार सात हज अदा किए। एक दिन ख़्वाब में पैग़म्बरे इस्लाम मुहम्मद स.अ.व. ने हुक्म दिया कि आप हिन्दोस्तान जाएं और बरेली (उ.प्र.) का ख़ानक़ाह हज़रत शाह नियाज़ अहमद र.अ. का नक़्शा दिखा दिया गया। चुनांचे आपने काबुल होते हुए हिन्दोस्तान का सफ़र प्रारम्भ किया। सबसे पहले आप सन 1268 हिजरी में दिल्ली तषरीफ़ लाए फिर बरेली पहुंचे। सन 1287 हिजरी में बरेली से आपको सनद ख़िलाफ़त अता की गई तथा अपने वतन बदख़्शान वापिस जाने का आदेश मिला। आप आदेश के पालन में वापिस बदख़्शान गए। वहां से हज के लिए मक्का-मदीना गए। इसबार आपको पुनः सरकारे मदीना से हुक्म मिला कि हिन्दोस्तान जाकर दीन का प्रचार करो। आदेशानुसार आप वापिस हिन्दोस्तान तशरीफ़ लाए। इसबार आपने लखनऊ में क़याम किया। लखनऊ से बरेली आए तथा कुछ दिन क़याम करके सन 1297 हिजरी में भोपाल तशरीफ़ लाए। भोपाल में उस वक़्त नवाब शाहजहां बेगम का दौरे हुकूमत था। भोपाल में आपका क़याम घाटी भड़भूंजा में जनाब अब्दुल लतीफ़ ख़ान साहब के मकान पर रहा। सन 1301 हिजरी में आप ईशवरीय आदेश से नरसिंहगढ़ तशरीफ़ लाए। नरसिंहगढ़ में जनाब मुंशी अब्दुल अज़ीज़ साहब ए.डी.सी. महाराजा नरसिंहगढ़ के यहां क़याम रहा। सन 1309 हिजरी में जनाब मुंशी अब्दुल अज़ीज़ साहब मुलाज़ेमत के सिलसिले में राजगढ़ आए तो बाबा साहब को भी अपने साथ राजगढ़ ले आए और अपने मकान के पास एक अलग मकान बाबा साहब के लिए दिया जिसे ख़ानक़ाह बनाया गया। काफी समय तक आपने इसमें ही निवास किया। भोपाल, नरसिंहगढ़ तथा राजगढ़ के निवास के दौरान आपसे कई करामतें ज़ाहिर हुईं जिससे काफी तादाद में लोग इस्लाम में दाख़िल होते रहे। आजीवन आप लोगों को इंसानियत, आपसी भाईचारा, प्रेमभाव तथा दीने हक़ अर्थात सत्य पर चलने की शिक्षा देते रहे।

अल्लाह अपने इन ख़ास बन्दों को आने वाली घटनाओं से भी आगाह कर देता है। इसी तरह आपको भी अपने अंतिम समय की सूचना अल्लाह तआला द्वारा दी गई। अतः आपने अपने मुरीदों को जमा कर कहा कि, अब हम शहर में नहीं रहेंगें हमारे लिए शहर से बाहर जंगल में एक झोंपड़ी (कुटिया) बना दी जाए। लिहाज़ा शहर से बाहर जंगल में नाले के किनारे एक झोंपड़ी (कुटिया) बना दी गई। जिसमें लगभग छः माह आपने निवास किया। स्वर्गवास से एक दिन पहले आपने अपने लिए क़बर भी स्वयं तैयार करवाली और मुरीदों को दफ़न-कफ़न के संबंध में समझाइश दी। यह ख़बर सुनते ही शहर के लोगों का हुजूम भारी संख्या में आपके दर्शन के लिए उमड़ पड़ा। सन 1914 ईस्वी में इस्लामी माह रमज़ान मुबारक की 20 तारीख़ को आप इस दुनिया से इन्तेक़ाल फ़रमा गए।
आपकी क़बर मुबारक पर एक दस्तावेज़ के अनुसार 28 अगस्त 1915 को हुए एग्रीमेन्ट के तहत जनाब शैख़ शबराती ठेकेदार के मार्फत रामलाल कुम्हार निवासी बिरजीपुरा तथा ख्वाजू मोमन निवासी गंज राजगढ़ द्वारा आलीशान मक़बरा तैयार किया गया। जो आज भी अपनी पूरी शानो-शोकत के साथ मौजूद है। जिसे दरगाह बाबा बदख़्शानी के नाम से जाना जाता है। बाद में दरगाह के आसपास मस्जिद, सहदरी, मेहमानख़ाना, लंगरख़ाना तथा अन्य इमारतें तामीर कराई गईं। जिनका आवशकतानुसार समय समय पर विस्तार किया जाता रहा और आज भी जारी है। प्रतिवर्ष 10 से 12 मार्च को दरगाह शरीफ़ पर उर्स का आयोजन किया जाता है। जिसमें देश ही नहीं बल्कि विदेशो से ज़ायरीन आते है। उर्स के दौरान पूरी रात महफ़िले समा अर्थात क़व्वालियों का कार्यक्रम आयोजित होता है जिसमें देश की मशहूर क़व्वाल पार्टियां सूफ़ियाना कलाम पैश करती हैं। साथ ही एक बड़े मेले का भी आयोजन होता है जिसमें हज़ारों की संख्या में दूकाने व मनोरंजन के साधन आते हैं। सभी धर्म तथा समाज के हज़ारों-लाखों लोग बिना किसी भेदभाव के दरगाह पर हाज़िर होते हैं तथा अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। विगत 100 वर्षों से यह स्थान सर्वधर्म सम्भाव तथा साम्प्रदायिक सद्भाव का प्रतीक बना हुआ है।

  चिड़ीखों -नरसिंहगढ़  

नरसिंहगढ़ वाइल्ड लाइफ संचूरी वन प्रभाग राजगढ़ सामाजिक वानिकी के तहत 1978 में स्थापित किया म-प्र का 35 संचूरी है। अभयारण्य NH12 (जबलपुर-जयपुर) भोपाल से 70 किलोमीटर दूर, इंदौर से 221 किलोमीटर, ब्यावरा से 35 किलोमीटर और कोटा से 278 किलोमीटर पर स्थित है।
समुद्र तल से ऊंचाई 462.07-576.08 मीटर है । यह 57.197 वर्ग किमी (रिजर्व वन) क्षेत्र है । अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण यह राजगढ़ जिले की सबसे खूबसूरत जगह में से एक है, यह "कश्मीर मालवा के" क्षेत्र के रूप में जाना जाता है।

इस अभयारण्य में "चिड़ीखों झील" पर्यटकों के बीच आकर्षण केंद्र है। इस अभयारण्य को शासकों द्वारा शिकार के प्रयोजन के लिए इस्तेमाल किया जाता था । अलग-अलग स्थानों से प्रवासी पक्षी इस अभयारण्य में यहां तक पहुँचते है। स्थानीय लोगों को लिए "चिड़ीखों झील" विशेष झील है। इस अभयारण्य में हम स्थानीय पक्षियों और प्रवासी पक्षियों की एक झलक देख सकते है। राज्य पक्षी दूधराज मुख्य रूप से इस अभयारण्य में यहां देखा जाता है। राष्ट्रीय पक्षी मोर मुख्य रूप से इस अभयारण्य में और आसपास के क्षेत्रों में देखा जाता है। जलवायु राष्ट्रीय पक्षी मोर के लिए उपयुक्त है। इस अभयारण्य के मयूर पार्क क्षेत्र में जंगली जानवरों के लिए पर्याप्त स्थान है बड़ी संख्या में और सांभर में चीतल, नीलगाय मुख्य रूप से पाए जाते हैं। उन्हें स्वतंत्र रूप से इस अभयारण्य में घूमते देख सकते हैं।

  ब्यावरा मांडू-नरसिंहगढ़  

गांव 1000 से अधिक वर्ष पुराना है इसका नाम कुलमी पटेल के नाम पर रखा गया है । मुस्लिम सैनिकों को यहां तैनात किया जाता था । कहा जाता है कि यहा से उन्होने बिहार (नरसिंहगढ़) में पांच सोला खंबा देखा था । यह सारंगपुर तहसील से कालीसिंध नदी के तट से 10Km पर स्थित है। यह 1813 और 1847 में लड़ाई के समय उपयोग मे लाया गया था

  कोटरा -नरसिंहगढ़  

यह एक बार राजगढ़ राज्य की एक तहसील था। यह नरसिंहगढ़ के दक्षिण से 10 किमी दूर स्थित है। कोटरा एक पहाड़ी स्थान है ओर जंगल घना होने के कारण शेर , चीते तेंदुआ साँभर चीतल हिरण आदि जानवर अधिक संख्या मे पाये जाते है यही कारण है की यह राज्य का एक प्रमुख शिकार का स्थान था । यह जंगल के किनारे कुछ पुराने सिकरगाह (शिकार स्थान) है।

  खोयरी महादेव मंदिर-राजगढ़  

खोयरी महादेव का एक सुंदर मंदिर राजगढ़ से सिर्फ 1 किलोमीटर दूर है। । यह राजगढ़ की पसंदीदा पिकनिक स्पॉट में से एक है।